जितेन्द्र जैन ( जीतू ) की कलम से,
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक नाम ज़ोरों पर है – वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) से राजनीति में आए चौधरी अपनी तेज-तर्रार कार्यशैली और कड़े फैसलों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन, अब यही कार्यशैली जनता और पार्टी के भीतर से ही बड़े विरोध का कारण बन रही है। सूत्रों की मानें तो उनकी कार्यप्रणाली से न सिर्फ विपक्षी दल, बल्कि खुद भारतीय जनता पार्टी के विधायक और आम जनता भी खासी नाराज़ हैं।
यह स्थिति, राजनीतिक गलियारों में, डॉ. रमन सिंह के पूर्व कार्यकाल की याद दिला रही है, जब कुछ मंत्रियों की मनमानी के कारण जनता में भारी आक्रोश था और जिसका खामियाजा पार्टी को 15 साल बाद सत्ता गंवाकर भुगतना पड़ा था।
विधायक से त्रस्त, फैसलों से हाहाकार
जनप्रतिनिधि या प्रशासक ?
रायगढ़ विधानसभा क्षेत्र, जिसका प्रतिनिधित्व ओ.पी. चौधरी करते हैं, वहां के लोग भी अल्प समय में ही अपने विधायक से त्रस्त बताए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि मंत्री जी का रवैया एक जनता के सेवक से ज़्यादा एक कड़क प्रशासक का होता है।
सड़क पर उतरी जनता :
सबसे बड़ी चिंता उनके द्वारा लिए गए फैसलों को लेकर है। जानकार बताते हैं कि जब भी उन्होंने कोई बड़ा फैसला लिया, प्रदेश में हाहाकार मच गया। हाल ही में, दुर्ग जिले में जमीन की सरकारी दरों (कलेक्टर गाइडलाइन) में एकमुश्त 300 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी का फैसला इसका ज्वलंत उदाहरण है। इस अव्यावहारिक वृद्धि के खिलाफ जमीन कारोबारी, क्रेडाई और आम जनता सड़कों पर उतरने और पुतला दहन करने को मजबूर हो गए। मामला अब न्यायालय तक पहुंचने की तैयारी में है।मुख्यमंत्री की “खामोशी” बनी ढाल :
मुख्यमंत्री की “खामोशी” बनी ढाल :
बताया जाता है कि पार्टी के कई विधायक भी उनकी कार्यशैली से नाखुश हैं और इसकी शिकायत मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से कर चुके हैं। लेकिन, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की तरह ही, वर्तमान मुख्यमंत्री की खामोशी के चलते उनका बाल भी बांका नहीं हो पा रहा है।
जोगी मॉडल की पुनरावृत्ति का डर :
राजनीतिक विश्लेषक इस स्थिति को स्वर्गीय अजीत जोगी के शुरुआती दौर से जोड़कर देख रहे हैं। जोगी जी भी राजनीति में आने से पहले IAS अधिकारी थे और छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने थे। अपने तीन साल के कार्यकाल में, उन पर भी यह आरोप लगा था कि उन्होंने प्रशासनिक अनुभव का ज़्यादा और राजनीतिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल कम किया। जोगी जी की तरह ओ पी चौधरी भी अपनी अधिकारी वाली कार्य प्रणाली नहीं छोड़ पा रहे हैं। एक नेता को जनता की बात धैर्य से सुननी होती है, जबकि एक अधिकारी त्वरित और कठोर निर्णय लेता है। यही ताल मेल की कमी पार्टी को महंगी पड़ सकती हैं।
जनता के बीच यह भी चर्चा है कि ओ.पी. चौधरी के आम लोगों से बातचीत करने का तरीका भी अहंकारपूर्ण होता है, जो एक जनप्रतिनिधि के लिए सबसे बड़ी कमी है।
इस बार हार का कारण बनेंगे ‘मंत्री’ :
जिस तरह पिछली बार एक वर्ग की नाराज़गी ने सत्ता परिवर्तन करवाया था, उसी तरह आज भी लोग खुलकर कह रहे हैं कि इस मंत्री की वजह से पार्टी अगला चुनाव हारेगी।
भाजपा को समझना होगा कि जनता का आक्रोश जब ‘सर से ऊपर’ हो जाता है, तो किसी की भी ‘कृपा’ काम नहीं आती। समय रहते, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को इस प्रशासनिक अधिकारी-मंत्री की लगाम खींचनी होगी और उन्हें यह याद दिलाना होगा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी सत्ता जनता की होती है, न कि किसी ज्ञानी प्रशासक की।










