मुरदण्डा एम्बुश की नाकामी के बाद नक्सली रणनीति में बदलाव, सीआरपीएफ की त्वरित जवाबी कार्रवाई से नेतृत्व में बढ़ी घबराहट
बीजापुर, 27 मई 2026 ( आशीष पद्मवार )
छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर में वर्ष 2025 में हुए मुरदण्डा एम्बुश की विफलता ने नक्सली संगठन के भीतर गहरी बेचैनी पैदा कर दी थी। सरेंडर कर चुके नक्सली कमांडर हेमला विज्जा ने दावा किया है कि सीआरपीएफ की तेज और रणनीतिक जवाबी कार्रवाई के बाद नक्सली नेतृत्व को पहली बार बड़े स्तर पर अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा।
पूर्व में प्लाटून नंबर 9 और 10 का इंचार्ज रह चुके हेमला विज्जा ने बताया कि 08 जुलाई 2025 को मुरदण्डा क्षेत्र के बायगुड़ा जंगल में 229वीं वाहिनी सीआरपीएफ की आरएसओ ड्यूटी में लगी टीम को निशाना बनाकर सुनियोजित हमला किया गया था। नक्सलियों की योजना जवानों को नुकसान पहुंचाने के साथ उनके हथियार लूटने की थी।

उसके मुताबिक, इलाके के घने जंगल, बड़े नाले और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए तीन दिशाओं से घेराबंदी की गई थी। हमले में कई सशस्त्र नक्सली कमांडर शामिल थे। अलग-अलग टीमों को सहायता बल रोकने, पीछे से फायरिंग करने और विस्फोटक हमले की जिम्मेदारी दी गई थी। नक्सलियों के पास बीजीएल, आईईडी और आधुनिक हथियार मौजूद थे।
हेमला विज्जा ने बताया कि जवानों को निशाने में लेते ही नक्सलियों ने फायरिंग और आईईडी ब्लास्ट शुरू कर दिए, लेकिन सीआरपीएफ जवानों ने तत्काल मोर्चा संभालते हुए जवाबी कार्रवाई की। इसी दौरान अतिरिक्त सहायता दल अप्रत्याशित दिशा से जंगल के भीतर पहुंच गया और पीछे से हमला शुरू कर दिया। मोर्टार और लगातार फायरिंग से नक्सली दस्तों में अफरा-तफरी मच गई।

उसने दावा किया कि नक्सलियों ने जिस दिशा से सहायता बल आने की संभावना मानी थी, वहां पहले से घेराबंदी कर रखी थी, लेकिन सुरक्षा बल ने अलग रणनीति अपनाते हुए पीछे से पहुंचकर हमला किया। यही वजह रही कि पूरी योजना कुछ ही मिनटों में बिखर गई।
हेमला विज्जा के अनुसार, सहायता दल महज 10 से 15 मिनट के भीतर घटनास्थल तक पहुंच गया था, जिसने नक्सलियों को चौंका दिया। लगातार जवाबी फायरिंग और जवानों की बढ़ती आवाजाही से नक्सलियों को लगा कि बड़ी संख्या में सुरक्षा बल पहुंच चुका है, जिसके बाद वे जंगल की ओर भाग निकले।
उसने यह भी बताया कि मुठभेड़ के दौरान कई नक्सली बिखर गए थे, जबकि कुछ घायल भी हुए। एक टीम से संपर्क टूटने की स्थिति भी सामने आई थी।
सरेंडर नक्सली कमांडर के मुताबिक, इस घटना के बाद संगठन के भीतर गंभीर समीक्षा बैठक हुई, जिसमें यह माना गया कि दक्षिण बस्तर में तेजी से बढ़ रहे सुरक्षा कैंपों और सीआरपीएफ की नई रणनीति के कारण बड़े हमलों को अंजाम देना पहले की तुलना में काफी कठिन हो गया है। इसके बाद नक्सलियों ने छोटे समूहों में काम करने और आईईडी आधारित हमलों पर ज्यादा जोर देने की रणनीति पर विचार शुरू किया।
जानकारी के अनुसार, मुरदण्डा ऑपरेशन में घायल होने के बावजूद सीआरपीएफ जवानों ने मोर्चा नहीं छोड़ा और अपने साथियों व हथियारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए प्रभावी जवाबी कार्रवाई जारी रखी।






